April 14, 2026

सुनहरे पल (लघुकथा)

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रणजोध सिंह

रणजोध सिंह

शर्मा जी एक साधन संपन्न परिवार के मुखिया थे| उनके घर के हर कमरे में पंखा तथा ऐ.सी. (वातानुकूलक यंत्र) लगा हुआ था| ज्येष्ठ महीने की तपती दोपहरी में अचानक सरकार ने बिजली का कट लगा दिया| खैर! शर्मा जी के पास इनवर्टर का प्रावधान भी था| मगर इनवर्टर के सहारे केवल पंखे ही चल सकते थे, ऐ.सी. नहीं| उन्हें इस बात का इत्मिनान था कि चलो पंखे तो चल रहे हैं| घर में तीन शयन कक्ष थे तथा तीनों में पंखे चल रहे थे| अचानक शर्मा जी को याद आया कि उनके घर में इनवर्टर लगे हुए काफी समय हो गया है, अतः पंखे भी एक दो घंटे से ज्यादा नहीं चलेंगे| उन्होंने घर के सब सदस्यों को एक कमरे में आने का आदेश दिया ताकि जब सभी लोग एक ही कमरे में होंगे तो एक ही पंखा चलेगा और बिजली की कम खपत होगी| इस विधि से शाम तक एक पंखा तो चल ही जाएगा| फिर शाम को तो बिजली ने आ ही जाना था|

घर के सारे सदस्य पहली बार एक साथ एक कमरे में बैठे और पहली बार उन्हें एहसास हुआ कि परिवार क्या होता है| उनके पुत्र अपने बचपन के किस्सों को याद कर, ऐसे प्रसन्न हो रहे थे जैसे कोई खजाना मिल गया हो| घर की महिलाएं समय बिताने के लिए एक दूसरे के वस्त्र-विन्यास की खुलकर तारीफ करने लगी| शर्मा जी की पत्नी तो अपनी दोनों बहुओं को एक साथ अपने कमरे में देख फूली नहीं समा रही थी| छोटे बच्चें गर्मी की परवाह किये बगैर धमाचोकड़ी कर रहे थे| तभी छोटी बहु हाथों में ट्रे लिए सभी के लिए आम का पन्ना बनाकर ले आई, जिसकी मिठास ने सबकी आत्मा को तृप्त कर दिया| घर की बड़ी बहु ने छोटी बहु की खुलकर तारीफ की, और जाने-अनजाने ये पल इस परिवार के सुनहरी पल बन गए|

अचानक बिजली आ गई और सभी लोग तुरंत अपने-अपने कमरे में जाकर कैद हो गए| वहां ऐ.सी. की ठंडक तो थी मगर जीवन के सुनहरी पल गायब हो चुके थे|

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