April 14, 2026

सृजन की पीड़ा – रणजोध सिंह

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रणजोध सिंह – नालागढ़

सृजन की पीड़ा

सदैव

कष्ट दयाक होती है|

एक माँ नौ महीनें

रखती है बच्चे को अपनी कोख में,

अपार वेदना सहती है|

तब कहीं ये दुर्लभ कृति

जिसे कहते है मानव

दुनिया में आती है|

 

एक प्रश्न

मेरी आत्मा

सदैव उठाती है|

प्रसव पीड़ा औरत के

हिस्से में ही क्यों आती है?

अरे !

आप तो हँसने लगे

मैं जनता हूँ

विधि का विधान,

इस पीड़ा को धारण करने वाली ही,

माँ कहलाती है|

मेरी आत्मा तुरंत

सैंकड़ो नये सवाल उठती है|

 

पूछती है

राम भी तो सीता-वियोग में,

वन वन विचरते रहे,

फिर अग्नि परीक्षा

सीता के हिस्से में ही क्यों आती है?

छल-कपट करता है इंद्र

ऋषि गौतम की प्राणप्रिया से

फिर क्यों निर्दोष अहिल्या

ऋषि का कोपभाजन बन जाती है?

 

इतिहास के पन्नों को

कई बार खंगाला मैंने

एक भी राणा पत्नी की वेदी पर

सता नहीं हुआ

जिन्दगी सबको भाती है|

फिर क्यों पद्मावती ही

पति-वेदी पर सती हो जाती है?

 

दिल कहता है लिंग-भेद

एक जघन्य पाप है,

मगर दिमाग आत्मघाती है|

दिल और दिमाग की कशमकश में

हमसे अक्सर गलती हो जाती है|

मेरा प्रश्न अब भी

ज्यों का त्यों है|

खबर हो,

लड़के के आमद की

दुनिया वारी जाती है|

खबर हो

लड़की के आमद की

फिर क्यों भ्रूण-हत्या हो जाती है?

अतिथि देवो भव: (लघुकथा) – रणजोध सिंह

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