Tag: रणजोध सिंह

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अतिथि देवो भव: (लघुकथा) – रणजोध सिंह

रणजोध सिंह - नालागढ़ गोधूलि का समय था। त्रिपाठी जी ने बहुत धीरे से सुगंधा अपार्टमेंट की डोर वैल बजा दी। - कौन है ? ...

पति-परमेश्वर (कहानी) – रणजोध सिंह

रणजोध सिंह - नालागढ़ उस दिन होली का दिन था, महाविद्यालय के सभी प्राध्यापक व विद्यार्थी मिलकर महाविद्यालय परिसर में रंगों से सरोवार थे| अचानक...

जड़ों का दर्द – (कविता) – रणजोध सिंह

रणजोध सिंह  - नालागढ़ महकते हुए हसीं गुल ने अपनी जड़ों से पूछा, तुम्हारा वजूद क्या है? जवां बेटे ने अपने बुड़े बाप से पूछा, आपने मेरे लिए किया...

सजा (लघुकथा) – रणजोध सिंह

रणजोध सिंह - नालागढ़ अध्यापन प्रोफेशन में होने के कारण नित्यान्द जी अक्सर ट्रैफिक रूल्स की न केवल वकालत करते थे, अपितु विधिवत रूप से...

माय लविंग फैमिली – रणजोध सिंह

रणजोध सिंह - नालागढ़ उस दिन संध्याकाल के समय, मैं सपत्नीक अपने अभिन्न मित्र के घर गया हुआ था| मित्र एक सरकारी नौकरी में उच्च...

मेरा भारत महान – रणजोध सिंह

रणजोध सिंह - नालागढ़ गीता यहां, कुरान यहां बाइबल और ग्रंथ साहिब भी साथ-साथ यहाँ रहते हैं| बेशक भिन्न वेश-भूषायें हैं, बोलियां भी अपनी भिन्न है फिर भी हर सुख-दुःख, हम...

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