न होने में होने की संभावनाओं को देखती कविताएं — जीने के लिए ज़मीन

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एक कविता लिखने में पहला कदम लिखने के लिए एक विषय का निर्धारण करना होता है, यह तय करना काफी मुश्किल है कि आप क्या लिखना चाहते हैं, या अपनी किन भावनाओं को व्यक्त करना चाहते हैं। जब तक आपने खुद को एक विशिष्ट विषय नहीं सौंपा, कहां से और कैसे शुरू करें, यह एक प्रश्न दिमाग मैं रहता है। कई बार युवा लेखकों द्वारा इसी तरह के सवाल उठाए जाते हैं, लेकिन जब अनुभवी लेखकों की बात आती है, तो उनके पास लिखने का यह हुनर होता है, कि शब्द बस बहने लगते हैं। भावनाओं और परिवेश की उनकी गहरी समझ, और संवेदनाओं या अनुभवों को आसानी से कलमबद्ध करना काव्य कौशल या शिल्प है जो उनके लेखन को इतना सहज और सार्थक बना देता है।

मिलिए शिमला से हिंदी के जाने-माने कवि आत्मा रंजन से, जिनके कविता संग्रह “जीने के लिए ज़मीन” का विमोचन एवं परिचर्चा 21 दिसंबर, 2022 को हुआ । वह हि॰प्र॰ उच्च शिक्षा विभाग में वरिष्ठ माध्यमिक स्तर पर प्रवक्ता हिन्दी के पद पर कार्यरत हैं।

इनका जन्म 18 मार्च 1971 को शिमला के निकट गाँव हरीचोटी चनारडी (धामी) में एक साधारण किसान परिवार में हुआ । एम ए, एम फिल (हिन्दी साहित्य) हि॰प्र॰ विश्वविद्यालय शिमला से। शुरू से ही लिखने का शौक था जिसके चलते देश भर की प्रतिष्ठित पत्र-पत्रिकाओं में कविताएं, कुछ कहानियाँ और आलेख आदि निरंतर प्रकाशित होते रहे। कुछ रचनाएँ महत्वपूर्ण संपादित संग्रहों में भी शामिल हुईं।

इनका पहला कविता संग्रह ‘पगडंडियाँ गवाह हैं’ अंतिका प्रकाशन से 2011 में प्रकाशित हुआ । पंजाबी व हिंदी के सुपरिचित कवि/अनुवादक अमरजीत कौंके द्वारा यह समूचा संग्रह पंजाबी में पुस्तकाकार अनूदित व प्रकाशित भी हुआ। इसके बाद उनका दूसरा कविता संग्रह “जीने के लिए ज़मीन” 2022 में प्रकाशित हुआ।

अनेक कविताओं का अंग्रेज़ी, पंजाबी, उर्दू, गुजराती, मलयालम, बांग्ला, असमिया, नेपाली आदि में भी अनुवाद प्रकाशित । परिचित कवि/अनुवादक मीनाक्षी एफ. पॉल द्वारा अनूदित एक कविता हि.प्र. विश्वविद्यालय के स्नातक अंग्रेजी पाठ्यक्रम में भी शामिल।

रंजन जी को युवा शिखर साहित्य सम्मान, सूत्र सम्मान (छतीसगढ़), सृजनलोक युवा कविता सम्मान (चेन्नई), ओकार्ड इंडिया (दिल्ली) के साहित्य सृजन सम्मान, नवल प्रयास साहित्य भूषण सम्मान, कल्पतरु (नोएडा) सृजन सम्मान आदि से सम्मानित किया जा चुका है ।

राजेश जोशी, हिंदी के एक प्रख्यात लेखक, कवि, पत्रकार और एक नाटककार हैं, जिन्हें 2002 में हिंदी में साहित्य अकादमी पुरस्कार से सम्मानित किया गया था। आत्मा रंजन द्वारा लिखित कविता संग्रह के बारे में कुछ शब्द साझा करते हैं हुए कहते है, “आत्मा रंजन की ये कविताएं जीवन की उन लुकी छिपी संभावनाओं को बचाने की कविताएँ हैं जिनमें उड़ाने हैं, बीज के छतनार वट–वृक्ष में बदलने की संभावनाएं हैं। यह एक ऐसी आग की कविता है जिससे जलने की नहीं पकने की गंध आती है। जो मनुष्य की रोटी और रोशनी से जुड़ी है। आत्मा रंजन की कविता वस्तुतः जीवन की बहुत साधारण चीज़ों और बहुत साधारण और सामान्य लगती क्रियाओं में नये अर्थ तलाश करती है। वह साधारणता में छिपी असाधारणता को ढूंढ लेती है। वह स्पर्श और थपकी में लड़ने के हौसले को देख लेती है, क्योंकि वह थपकी के बीच आटे की लोई के रोटी के आकार में बदलने की क्रिया को लक्ष्य कर सकती है। यही कारण है कि वह जड़ों के जड़ हो गये या मान लिए गये अर्थ से अलग उसमें छिपी ऊर्जा को देख भी सकती है और समझ भी सकती है।”

“यह एक ऐसी कविता है जो बार बार कुचले जाने के ख़िलाफ़ उठ खड़े होने वाली घास को पहचानती है। इस कविता को किसी भी चीज़ के किसी अन्य चीज़ में होने की आकांक्षा नहीं है, वह अपने होने में ही चीज़ों के सुंदर होने को देख सकती है। यह कविता बंद पड़े दरवाज़ो पर साँकल की तरह दस्तक देती है। यह हमारे समय की विडंबनाओं और विद्रूपों के ख़िलाफ़ न केवल प्रतिरोध की बल्कि एक लगातार जूझते व्यक्ति की कविता है। यह कविता सबके जीने के लिए ज़मीन की आकांक्षा की कविता है।”

“इसमें अपनी ज़मीन और अपनी भाषा की गंध है। झूंंब, हूल, कुटुवा, गाडका, बियूल की टहनियां जैसे अनेक स्थानीय संदर्भ हमारी भाषा में कुछ नया जोड़ते हैं। इन कविताओं में हमारे समय के बहुत सारे सवाल, महामारी से उपजे संकट और नफ़रत की राजनीति से बढ़ रही हिंसा, बाज़ारवाद और यूज़ एंड थ्रो की संस्कृति के अनेक चेहरे उजागर होते हैं।”

इस किताब के शीर्षक के विषय में पूछे जाने पर कवि रंजन का कहना है इसमें एक कविता है, “‘मिले सबको” शीर्षक से, जो कि एक प्रार्थना की तरह लिखी गयी कविता है… कि सबको मिट्टी, नमी, धूप, आग… मिले उगने, पनपने, बढ़ने के लिए.. आगे कविता कहती है कि यही नहीं.. मिले सबको पंख, उड़ने के लिए खुला एक आसमान और आखिर में कविता कहती है कि भूत ज़रूरी है कि मिले सबको पंख और खुला आसमान जरूरी है उड़ने के लिए। लेकिन उससे भी ज़्यादा ज़रूरी है कि मिले सबको – जीने के लिए ज़मीन। पंख जरूरी और उड़ान भी.. लेकिन जीने के लिए उससे भी जरूरी है ज़मीन…”

यह गहरे अर्थ और रूपकों के साथ एक अद्भुत कविता संग्रह है जो एक इंसान या हमारी भावनाओं के रूप में हमारे दैनिक जीवन और पर्यावरण के साथ हमारे घनिष्ठ संबंधों की भी व्याख्या और पड़ताल प्रस्तुत करता है। हमें जीने के लिए बस थोड़ा सी ज़मीन तो चाहिए ही।

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