February 21, 2026

नटखट भयो राम जी — गंगा राम राजी

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गंगा राम राजी 

दादा राम के घर दो पोते, बस समझो सारे घर में कोहराम सा मच जाता जब दोनों बच्चे स्कूल से घर पहुंचते। दादा की नजरें भी पोते पर हमेशा ही जमीं रहतीं यह देखने के लिए कि महाराज क्या कर रहें हैं और जब घर में उनके होते हुए शांति हो तो समझो कोई खुराफात अवश्य ही हो रही होगी। टी वी पर देखे स्पाइडरमैंन की कोई कला का प्रदर्शन या गिलासों में पानी भरकर एक दूसरे पर फैंक रहे होते या फिर होली के समय लाई गई पिचकारियों में पानी भर कर एक दूसरे पर मार रहे होते।

बस इसी तरह से दादा एक दिन दोपहर को सोए आराम कर रहे थे कि छोटा नटखट पिचकारी में पानी भर कर लाया और दादा के पाजामें में दे मारा। दादा तो जोर से चिल्लाया,

‘‘ क्या है बे कौन है …. ’’

देखा तो पाजामा गीला। इधर उधर देखा,  कहीं कोई नहीं !

दादा ने इधर उधर आगे पीछे देखा कहीं कोई नहीं, दादा को तो पहले यह समझ ही नहीं आया कि क्या माजरा है ? जब कुछ समझ नहीं आया तो सारा ध्यान पोतों पर ही गया। तभी दादी भी अंदर आ गई,

‘‘ क्या हुआ है शोर क्यों ?’’

‘‘ बच्चे कुछ कर गए। यह देखो मेरा पाजामा … ’’

‘‘ बच्चें तो नीचे खेल रहे हैं। यहां तो कोई है ही नहीं। आपको सपना तो नहीं … ’’

‘‘ तुम भी, भागवान हमें ही … यह देख पाजामा …. सारा तर ब तर ….. ’’

पाजामे को देख दादी जोर से हंसी, चुटकी लेने की आदत तो उसकी थी ही, जैसे सभी आरतों में होती है,

‘‘ बस सू सू अपने से हो गया और नाहक बच्चों पर इलजाम … तुम भी तो बाज नहीं आए अपनी हरकतों से … । ’’

दादी को चारपाई के नीचे से किसी के हंसने की आवाज सुनाई दी तो झांक कर देखा कि छोटे वाला नटखट हाथ में पिचकारी लिए हंस रहा था। तभी दादी की समझ में आया कि यह कारस्तानी तो इसी की है और वह जोर से उसको खींचने लगी। छोटे नटखट ने जो पानी पिचकारी में रहा था उसे दादी पर चला दिया। दादी ने भी उसे बोलने के लिए मुंह खोला ही था, पिचकारी का पानी सारा मुंह के अंदर। दादी की बोलती बंद। वह एक ओर हुई ही नहीं थी कि नटखट जी चारपाई से बाहर निकल एक ओर खड़ा होकर जोर जोर से हंसने क्या लगा दूसरा नटखट स्पाइडर मैंन की भूमिका में आ पहुंचा।

दोनों नटखट खूब हंसने लगे और इधर दादी मुंह में गए पानी को एक ओर थू थू करने में व्यस्त। यह सब देख दादा भी हंसी रोक नहीं सका।

‘‘ मेरे मुंह में गंदा पानी गया है हुआ और आप हंस रहे हो …. थू ….  थू …. ’’

‘‘ अब पता चला, पहले तो मेरे को ही बोल रही थी कि पैजामें में अपने आप से सू सू हो गया है अब बता … ’’

‘‘ दादी इस पिचकारी में पानी भी बाथ रूम से भरा है … ’’

बड़े नटखट ने किसी नेता की तरह स्थिति को देखते हुए चुटकी ली।

उसकी बात से दादी फिर बाथ रूम में ही चली गई और बाहर उल्टी उल्टी करने की आवाजें सुनाई देने लगी तो इधर दादा अपने गीले पाजामें को बदलने लगा और हंसते भी जा रहा था।

दोनों बच्चे अपने मम्मी पापा के सामने डर के कारण इस तरह से कभी भी शरारत नहीं करते। वे तो दादा दादी के सामने ही सब करते हैं। उन्हें मालूम है कि दादा दादी कभी मारते नहीं, और शरारत होती तो इन दोनों की अध्यक्षता में ही, उनके साथ या उनके सामने शरारत करने का भी उन्हें मजा आता क्योंकि दादा-दादी के पास ही उन्हें असली आजादी मिलती।

इसी उधेड़ बुन में बड़ा कुछ ज्यादा ही शरारती और जिद्दी बनने लग गया था। उसे लगता कि छोटे को छोटा कह कर सजा कम मिलती उसकी गलतियों की सजा भी उसे ही मिलती है।

‘‘ तूं तो बड़ा है तूं ही सब्र कर लेता।’’

‘‘ मैं भी कितना बड़ा हू।’’ बड़ा अक्सर मार पड़ने पर बोलता रहता था। वह धीरे धीरे जिद्दी बनता गया। जब वह शरारत करता तो उसकी मम्मी अक्सर कहा करती थी,

‘‘ इसके मुंह में मिर्च दो .. ’’

यह मिर्च की सजा का फरमान दिन में कितनी ही बारी जारी होता परन्तु अंजाम तक नहीं पहुंचा। बच्चे मिर्च की इस सजा के फरमान से तो डरते थे ही। कभी एक बार कोशिश की भी थी ही परन्तु भाग खड़े हुए थे हाथ नहीं चढ़े।

अकसर मम्मी पापा छुट्टी वाले दिन कहीं घूमने चले जाते हैं या अपने मित्रों से मिलने चले जाते हैं और पीछे इन बच्चों को दादा दादी के हवाले छोड़ जाते हैं। बच्चे भी खुश रहते हैं अपने को पूरी तरह से आजाद समझते हैं। आजादी का भी एक गणित होता है। मनुष्य आजाद रहना ही चाहता है, आजाद रहना मानव का स्वभाव है। इसलिए ही वह आज तक इसी आजादी के लिए सघर्ष करता आया है।

यह तो मानव है कि उसने आजाद रहने के लिए भी नियम बना दिए हैं। समझ आता है कि आजाद रहना भी अपनी सीमाएं रखता है। आजादी उतनी ही आजादी है जितनी वह दूसरों की आजादी की सीमांए न लांघ लें। बच्चे जब अपनी आजादी की सीमांए लाघंते है तो उसे शरारत कहते हैं और उन्हें भी कभी कभी नियम तोड़ने की सजा मिलती रहती है। इससे पहले बच्चे नियम तोड़ने के आदी हो जाए, बच्चों के साथ रह कर समय लगा कर उन्हें उनकी सीमाओं का ज्ञान देना होता है।

बस दादा ने एक दिन नेट पर ‘ दो कलियां ’ फिल्म देखी तो फिल्म का एक गाना जो उनके मुह पर चढ़ गया था अपने बच्चों के स्वभाव पर, ‘एक दम से बच्चों का नाराज होना फिर अपने आप मान जाना’ पर एक कविता ही रच दी,

बच्चे मन के कच्चे

जैसे रबड़ के हो गुब्वारे

ऐसे कच्चे भूत हैं ये

भगवान भी इनसे हारे

खुद रूठें खुद मन जाए

जब जी चाहे तन जाए

इनको किसी से बैर नहीं

बिगड़ गए तो खैर नहीं …..

कविता क्या रची, अपनी पत्नी को सुनाई तो उल्टे ही शाबाशी मिली,

‘‘ बड़े आए कवि महोदय, ढोलक मढ़आई नहीं कि कवि बन गए …. ’’

कहां दादा समझा था कि कविता की प्रंशसा होगी उल्टे ही सर मुंडाते ओले पड़े। दुबक कर एक ओर चल दिए।

दादा दादी को भी तो पोतों के बिना चैन कहां ? स्कूल के बाद थोड़ी देर दिन में सो कर आराम तो करते हैं परन्तु पोते दादी को आराम करने ही नहीं देते।  हां दादू अक्स्र आराम कर लेता ही था।

सबसे अधिक दादा व्यस्त। उसे सबकी करनी पड़ती है, बेटे बहू अपनी डयूटी पर जाने से पहले उन्हें बहुत से काम देते आए हैं।

‘‘डैडी आज बच्चों की फीस बैंक में जमा करा आना, छोटे के स्कूल के बैग की रिपेयर करा आना …. टहलते हुए जाना बिजली का बिल भी दे आना ….. ’’ आदि।

फिर दादी के साथ जाना दादी की भी अपनी ही फरमाइशें होती। उनकी फरमाइशें कोई पोतों से कम थोड़े होतीं है। कभी बाजार जाना, ब्यूटिशियन के पास जाना, सब्जियां लाना आदि कई काम है जो वह दादा के साथ करतीं आईं है। लेकिन घर में अपने को व्यस्त बताना ही सबको आता है। दूसरों के काम तो लगते ही नहीं है किसी को। यहां तक कि बच्चे अपने को बहुत व्यस्त बताने लगे हैं। स्कूल का होम वर्क, खेलना कूदना आदि। यह खेलना कूदना भी अब उनकी दिनचर्या में शामिल हो गया है। पापा मम्मा ने आपस में बातें करनी हों तो बच्चों को भगा देते हैं,

‘‘ जाओ खेल आओ, जल्दी से … ’’ बच्चे हैं कि एक बार घर की गिरफ्त से छूटे तो घर आने का नाम ही नहीं लेते। चाहे फिर कितनी ही आवाजे क्यों न लगाई जाए।

एक बार घर आए हुए अंकल आंटी की बातों में रस लेते बड़े नटखट ने कान लगा कर सुन लिया था,

‘‘ यार , किसी की गाड़ी को चलाने से रोकना हो तो उसके साइलैंसर की पाइप में आलु डाल दो, देखो गाड़ी कभी स्टार्ट ही नहीं होगी जब तक कि आलु नहीं निकाल लेते …. ’’

बस यह बात नटखट ने अपने यहां गांठ में बांध ली, उसे कुछ न कुछ तो नया करना ही होता है और सबसे पहले इसका प्रयोग अपनी ही गाड़ी में किया गया।

सबने आज ‘सोनु के टीटू की स्वीटी’ फिल्म देखने जाना था। कार स्टार्ट ही न हो। बच्चे भी गाड़ी में बैठे थे। उधर फिल्म के लगने का समय हो रहा था। टिकट भी ऑन लाइन ले रखे थे। इधर गाड़ी स्टार्ट ही न हो। बड़े को अपनी कारस्तानी याद आ गई। फिल्म देखने की इच्छा उसकी भी प्रबल थी ही, झट से दोनों नटखट कार से नीचे उतरे और गाड़ी के पीछे साइलैंसर की पाइप की ओर गए। आलु फंसा था। आलु इस तरह से पक्का किया हुआ था कि आलु उनसे निकले नहीं।

‘‘ पापा इधर आओ’’

‘‘ क्या है … ?’’ पापा ड्राइविंग सीट से उतर कर पीछे की ओर हो लिया।

‘‘ यह देखो … आलु … ’’

पापाझट समझ गया कि ‘खुरापात इन बच्चों की ही है। कल उनका दोस्त इसी बात को लेकर बात कर रहा था तो दोनों महाशय के कान उस समय खड़े थे। यह तो मैं उस समय ही समझ गया था कि ये कुछ न कुछ कर देंगे। परन्तु यह पता नहीं था कि अपनी ही गाड़ी पर इसका प्रयोग कर देगंे।’

आलु निकाला और बोला, ‘‘ देखो यह बताओ किस ने किया है नहीं तो दोनों की सोनु के टीटू की स्वीटी बंद। जल्दी बताओ …. जल्दी बताओ … ’’ वह गुस्से से बोला। तो बच्चे डर गए थे।

‘‘ पापा बड़े ने किया है ….. ’’

‘‘ आलु तो तुमने ही लाया था …. ’’

बस बात स्पष्ट हो गई। बच्चे भी क्या करते उन्होंने अभी अभी तो नई चीज सीखी थी। चैरिटी बिगिनस एैट होम ’ का सिंद्धांत भी तो पापा मम्मा ने ही सिखाया था।

फिल हाल एक एक झापड़ दोनों को पड़ा। दोनों नाराज हो गए। कार में बैठने के बदले घर की ओर भाग गए। वे भी अच्छी तरह से जानते थे कि उनके बिना कोई भी फिल्म देखने नहीं जाएगा। इसलिए जो उन्हें झापड़ पड़ा उसकी नाराजगी जतानी भी तो उनका फर्ज बन जाता है।

फिर क्या सबका मूड खराब होने लगा। दादा की बारी आई। वह तो आनी ही थी। दादा दादी उतरे नीचे और बच्चों को मनाने उनके पीछे भागने लगे। वे कहां गिरफ्त में आने वाले थे, न दादा से दौड़ा जा रहा था न दादी से … थक गए तो बच्चों का गुस्सा गायब …  जब दादा ने अपने को गिरने का नाटक किया तो दोनों आ पहुंचे दादा के पास और फिर दादा ने उन्हें अपनीे आगोश में भर लिया।

उसी समय सब ऊपर घर आ गए। बच्चों के मम्मी पापा को बहुत गुस्सा आया हुआ था। बच्चे अपने से बाहर होते जा रहे हैं। बच्चों की मम्मी का पारा सातवें आसमान पर। फिल्म का समय निकलने लगा था। एक तो पहले ही घर से लेट हो गए थे दूसरे अब गाड़ी का काम हो गया। जब गाड़ी स्टार्ट हुई तो बच्चे भाग निकले। मम्मी को गुस्सा जो आया हुआ था बोली,

‘‘ इसके मूंह में मिर्च दो .. ’’

फिर क्या था बड़े ने तो अपने आप ही मिर्च खाने की जिद पकड़ ली। मम्मी ने सोचा था कि वह मिर्च के नाम से डर जाएगा। यहां तो पासा ही पलट गया। वह तो अपने आप ही मिर्च मांगने लग गया। सब हैरान होने लगे कि इसे आज क्या हो गया है। वह तो रो रो कर मिर्च मांगने लगा। सोचने लगे कि  बहू ने आज क्या पांगा ले लिया। उसने तो मक्खियों के छत्ते में हाथ दे मारा। उधर फिल्म चलने लगी होगी, समय ही निकलने लगा। इधर फिल्म का ध्यान किसी को नहीं अब तो इस नटखट का मिर्च शो शुरू हो गया। दादा दादी के लिए एक नई समस्या।

दादा दादी सब कोशिश करने लगे कि वह किसी तरह से शांत हो जाए परन्तु वह कहां मानने वाला था अपनी ही जिद पर अड़ा रहा।

‘‘ मैं तो मिर्च खाऊंगा … ’’

‘‘ देखो बेटे मिर्च खाओगे तो मुंह जल जाऐगा … ’’

‘‘ मम्मी क्यों, मुझे मिर्च खिलाने के लिए बार बार बोलती है। आज मैं मिर्च खाऊंगा ही … ’’

‘‘ अरे फिल्म शुरू हो गई है जल्दी करते हैं फिल्म देखनी है, चलो बेटे ….. फिल्म देखने के बाद हम सब मिर्च खाएंगे…  ’’

‘‘ मैंने कोई फिल्म नहीं देखनी है मैंने तो मिर्च खानी है अभी … लाओ मिर्च … ’’

घर वाले सारे परेशान हो गए। सोचने लगे कि यह अब बहुत ही जिद्दी हो गया है। इसका पता नहीं क्या करे। इसे समझाना चाहिए। मिर्च के बारे बताना चाहिए। सब कुछ करने के बाद भी जब वह माना ही नहीं तो दादा बोले,

‘‘ इसके धोती वाले टीचर शास्त्री जी जिनसे यह डरता है पड़ौस में ही तो रहते हैं। संडे है घर ही होंगे उन्हें बुलाया जाए। वही इसे मिर्च खिलवाएंगे।’’

आखिर में उसके धोती वाले गुरू जी बुलाए गए। वे बच्चों को सीधा करने के महारथी माने जाते हैं, बच्चे उनके पहनावे से ही डरते थे। सफेद कुर्ता, नीचे सफेद धोती, गले में रूद्राक्ष की माला और ऊपर सर जो चाणक्य की तरह सफाचट किया हुआ उसके मध्य लम्बी चोटी, छह फीट लम्बे, स्कूल में अनुशासन ढीला पड़ता तो उनकी मदद ली जाती , वे संदेशा मिलते ही यह सोच कर कि बच्चों को अनुशासन का पाठ पढ़ाना है तुरन्त आ पहुंचे।

आते ही शास्त्री जी सब ज्ञान प्राप्त कर सोचने लगे कि यह बच्चा क्या चीज़ है उसने तो बड़े बडां़े को पटरी पर खड़ा किया है। अपनी शिखा पर हाथ मारते हुए एक हाथ नटखट के सर पर रखते हुए बोले,

‘‘ मिर्च खाएगा …. ’’

‘‘ खाऊंगा … ’’

‘‘ क्यों खाएगा … ?’’

‘‘ मम्मी बोलती रहती है आज खाऊंगा ही … ’’

‘‘ लाओ मिर्ची …. ’’

शास्त्री जी के आदेश पर बड़ी लाल सी मिर्ची लाई गई।

‘‘ ले खा इसे … ’’

नटखट ने मिर्ची हाथ में पकड़ी देखी और नीचे रखते हुए बोला,

‘‘ आधी खाऊंगा …. ’’

गुरू जी ने मिर्ची के दो टुकड़े किए। एक टुकड़ा नटखट की ओर करते हुए शास्त्री जी बोले,

‘‘ लो खाओ … ’’

नटखट ने मिर्च को हाथ तक नहीं लगाया बोला,

‘‘ यह आधी पहले आप खाओ …. तभी खाऊंगा ….. ’’

शास्त्री जी क्या करते अपने नाम को बट्टा थोड़े लगाते। सोच रखा था कि इस बालक को ठीक करना है, नहीं तो अपना नाम बदनाम हो जाएगा। बस फिर क्या शास्त्री जी अपना नाक पकड़ कर किसी न किसी ढंग से आंख बंद करते हुए आधी मिर्च खा गए। पीछे से पानी के तीन गिलास गट कर गए। फिर भी सी सी करते अपने दांतों को पीसते हुए बोले,

‘‘ लो अब खाओ .. ’’

बस शास्त्री जी को मिर्च खाते देखते ही नटखट दहाड़ने लगा, जोर जोर से रोने लगा,

‘‘ आप शास्त्री जी वो टुकड़ा खा गए जो मुझे खाना था ……  जाओ मैं नहीं खाता … ’’

बस फिर क्या था शास्त्री जी को पहले ही मिर्ची लगी थी अपनी धोती पकड़ कर ,

‘‘ नटखट भओ राम जी’’ कहते हुए, सी सी करते हुए भाग गए।

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