राजेश पाल की लिखी आक्रोश और प्रतिरोध की कविताएँ – पुस्तक समीक्षा

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महेश पुनेठा

जीवन के अनुभवों से पैदा हुई गहरी पीड़ा और छटपटाहट उनकी कविताओं में अभिव्यक्त होती है, क्योंकि वह दृष्टा के अलावा भोक्ता भी हैं।

पिछले दिनों वरिष्ठ साहित्यकार राजेश पाल जी अपनी एक यात्रा के दौरान पिथौरागढ़ आए थे। एक संक्षिप्त किंतु आत्मीय मुलाकात हुई। उन्होंने स्नेह सहित अपने कविता संग्रह भेंट किया — राजेश पाल की प्रतिनिधि कविताएँ। उनकी कविताएं पहले भी पढ़ता रहा हूं। आत्मावलोकन के लिए प्रेरित करती रही हैं। उनका मूल स्वर प्रतिरोध है। राजेश पाल जी के इस संग्रह की कविताओं में गहरा आक्रोश और प्रतिरोध दिखाई देता है। वह संवैधानिक मूल्यों के पक्षधर कवि हैं। समाज में व्याप्त गैर बराबरी, शोषण और उत्पीड़न उनकी कविताओं का उत्स है। वह इसके खिलाफ पूरी मुखरता के साथ अपनी बात कहते हैं। पूरी निर्ममता से चोट करते हैं। यह भारतीय समाज में व्याप्त गैर बराबरी और अमानवीयता की सदियों पुरानी कठोर चट्टान को तोड़ने के लिए बहुत जरूरी है। जीवन के अनुभवों से पैदा हुई गहरी पीड़ा और छटपटाहट उनकी कविताओं में अभिव्यक्त होती है, क्योंकि वह दृष्टा के अलावा भोक्ता भी हैं। उनकी कविताएं संवैधानिक मूल्य के बारे में सोचने और उन्हें प्राप्त करने के लिए लड़ने का आह्वान पाठकों से करती हैं। पाल जी अपनी कविताओं में भेदभाव करने वाले और भेदभाव के शिकार दोनों को संबोधित करते हैं। दोनों को झकझोरते हैं। साथ ही भारतीय संविधान द्वारा असमानता को समाप्त करने के लिए किए गए सकारात्मक प्रावधानों पर उठाए जाने वाले सवालों का तार्किक जवाब देते हैं। व्यवस्था के पोषकों से तीखे सवाल भी करते हैं और उनके षड्यंत्रों को उजागर भी। वह केवल सहानुभूति रखने की नहीं बल्कि पक्ष में खड़े होकर गैर बराबरी की लड़ाई में शामिल होने की बात करते हैं….

तुम्हारी कोरी सहानुभूति नहीं
अधिकार के पक्ष में लड़ाई चाहिए।

इसलिए बहुत सारे विशेषाधिकार प्राप्त लोगों को यह कविताएं असहज भी कर सकती हैं।अपने सामाजिक सरोकारों के चलते वह बहुत बार काव्यात्मकता की शर्तों की परवाह भी नहीं करते हैं। कथ्य को पूरी तासीर के साथ पाठकों तक पहुंचा देने में अधिक बल देते हैं। “हांक” लगाना जरूरी मानते हैं। उनका बदलाव पर विश्वास है….

मैं कहता हूं घोर निराशा में भी आवाज दो
लोग जरूर आएंगे
हांक भी क्रांति है।

निश्चित रूप से यह विश्वास बने रहना चाहिए। इतिहास गवाह है हर अंधकार को तोड़ने में विश्वास की महत्वपूर्ण भूमिका रही है। विश्वास की इस नदी को अविरल रूप से प्रवाहित होते रहना चाहिए।

इस संग्रह की कविताओं का चयन और संपादन युवा लेखक डॉ. नरेंद्र वाल्मीकि द्वारा किया गया है। उनकी एक भूमिका भी इसमें है। उनकी यह पहल सराहनीय है। सामाजिक राजनीतिक व्यवस्था पर चोट करने वाली और सवाल खड़े करने वाली इन कविताओं को अधिक से अधिक पाठकों तक जाना चाहिए। किसी भी बदलाव की शुरुआत विचार से ही होती है। लोकतांत्रिक मूल्यों को जीवन व्यवहार में उतारने को बहुत अधिक जरूरत है। सही अर्थों में तभी लोकतंत्र मजबूत हो पाएगा।

अंत में यह भी कहता चलूं कि मुझे बार-बार लगता रहा कि यह कविता मुझ जैसे डरपोक के लिए ही लिखी गई हैं।

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