व्यक्तित्व विकास के महत्वपूर्ण पहलू — सीताराम शर्मा सिद्धार्थ

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सीताराम शर्मा सिद्धार्थ, शिमला 

मनुष्य वास्तव में विचारों का एक पुंज है। विचार व्यवहार में झलकते हैं । शरीर की सुंदरता से अधिक महत्वपूर्ण है भीतरी सुंदरता और यह सुंदरता हमारे अच्छे गुणों और हमारे व्यवहार से निर्मित होती है। इसी से हमारा व्यक्तित्व निखरता है। व्यक्तित्व विभिन्न तत्वों का एक समुच्चय है जिसमें शिष्टता और व्यवहारिक समझ सबसे महत्वपूर्ण है। शिष्टता यानी हम किस से कैसे पेश आएं, हमारा बात करने का तरीका क्या हो, हम अपने परायों के बीच कैसे उठे बैठें, कब क्या बोलें और क्या न बोलें, यदि व्यक्ति ने यह सीख लिया तो वह अपने आस पास के लोगों में पसंद भी किया जाता है और खूब मान-पान भी पाता है । शिष्टता के अभाव में व्यक्ति असभ्य कहलाता है और सामने नहीं तो पीठ पीछे हंसी का पात्र बनता है। यह बात याद रखने लायक है कि जब हम शिष्ट होंगे तभी विशिष्ट हो सकेंगे।

समाज के साथ व्यवहार में यही सद्गुण जिम्मेदारी की भावना के साथ मिलकर दूसरे अर्थों में सिविक सेंस कहलाते हैं। सिविक सेंस अर्थात् सामाजिक नैतिकता। हम दूसरे नागरिकों के प्रति कैसे पेश आते हैं, कैसे उन्हें मदद करते हैं और अलग अलग परिस्थिति में कैसे व्यवहार करते हैं, इसमें शामिल हैं । गलती होने और उसका भान होने पर उसे स्वीकारना और शर्मिंदा होना एक सद्गुण है। हमारी गलती से कोई अन्य व्यक्ति प्रभावित हुआ हो तो उन के समक्ष सामान्य तरीके से खेद प्रकट करना भी अच्छे होने की निशानी है जो गलती की पुनरावृति की संभावना को भी कम करती है।

हमारे व्यक्तित्व के ये अच्छे गुण यदि सभी नागरिकों में व्यापक रूप से विकसित हो जाएं तो यही हमारा राष्ट्रीय चरित्र बनता है। स्वच्छ रहना, अपने आस पास की स्वच्छता में सहयोग करना, अपना कचरा किसी सार्वजनिक अथवा दूसरे के स्थान पर न फैलाना, दूसरे के कार्यों के प्रति अनावश्यक रूप से दखल नहीं देना, किसी की निजता व व्यक्तिगत रुचि सहित उनकी आस्थाओं और मान्यताओं का सम्मान करना आदि इसके अनेक उदाहरण हैं जिसकी सूची लंबी हो सकती है। सिविक सेंस किसी के वास्तविक व्यक्तित्व को दर्शाती है जिसमें जिम्मेदारी की भावना सहित समाज के वे अनकहे मानदंड भी शामिल होते हैं कि दूसरों को असुविधा न हो । इसका ध्येय यही है कि सभी को अपने अपने रास्तों में सुचारू रूप से चलने में मदद हो सके।

सिविक सेंस का सीधा सम्बन्ध समाज के दूसरे इंसान के प्रति हमारी सोच से है। समाज, परिवार से शुरू होकर देश और दुनियां तक व्यापक हो सकता है। विनम्र होना, बुजुर्गों, महिलाओं, बच्चों और शारीरिक रूप से अक्षम लोगों के प्रति सम्मान से पेश आना, अपने कार्य और पेशे के लिए निष्ठावान रहना, बिना हॉर्न बजाए अपनी लेन में वाहन चलाना, अनावश्यक जोर जोर से बात न करना, अपना कचरा कूड़ेदान में ही फेंकना और केवल निर्दिष्ट स्थानों पर धूम्रपान करना आदि सभी कार्यों में हमारी यही नैतिक जिम्मेदारी झलकती है।

स्कूल कालेज से लेकर कार्यस्थल तक शिष्टाचार अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। इस के बिना इस दुनिया में लोग किसी के साथ भी संवाद करने में असमर्थ होंगे। शिष्टाचार छोटी आयु से ही सीखना होगा तभी यह हमारे संस्कारों में स्वाभाविक रूप से आ सकेगा और बड़ी आयु में फिर समस्या नहीं होगी। आज हम देखते हैं कि बहुत से युवा शिष्टता के अभाव में एक सामान्य बातचीत में असहमति होने पर तुरंत झगड़े पर उतारू हो जाते हैं। कुछ बड़ी आयु के लोग भी छोटों की कोमल भावनाओं पर ध्यान दिए बिना कुछ भी बोलकर उन्हें आहत कर देते हैं। हमारा अवांछनीय व्यवहार परोक्ष रूप में छोटों को भी ऐसा ही करने को प्रेरित करता है। दुर्भाग्य से आज के समय में हमारे सामूहिक नैतिक व्यवहार में कमी आई है । हम दूसरे अर्थों में केवल स्वार्थपरायण मानसिकता का शिकार हो रहे हैं। ऐसे में हम किसी की परवाह नहीं करना चाहते । हम सामान्यत: सहानुभूति और सम्मान दिखाने के लिए पीछे रहते हैं। हमें अपनी सांस्कृतिक, धार्मिक, सामाजिक, शैक्षिक और इससे भी अधिक अपने देश की सभ्यता पर गर्व होना चाहिए। लेकिन

इन सभी कारकों के बावजूद, हम अपने तौर-तरीकों और व्यवहार में पिछड़े जा रहे हैं। यही कारण है कि हम दुनियां में अपने सभ्य होने की दिशा के विपरीत अपनी खराब छवि प्रस्तुत कर रहे हैं। हम स्वच्छता के मामले में फिसड्डी हैं बल्कि जहां जाते हैं उस स्थान को भी गंदा कर देते हैं। हम किसी भी सार्वजनिक संपत्ति को बहुत लापरवाही के साथ इस्तेमाल करते हैं। पार्क के बेंचो का पेंट खुरच देते हैं, स्ट्रीट लाइट्स को तोड़ डालते हैं, फूल पौधों को अकारण तोड़ देते हैं। सरकारी अस्पताल, दफ्तर या किसी बस में भी हमें स्वामित्व की भावना नहीं होती । हम इस संपति के प्रति जिम्मेदारी का भान नहीं करते। हमारे दफ्तर, सड़कें और पार्क दूसरे देशों की निस्बत गंदे हैं। हमारे बाजारों में बिकने वाले खाद्य पदार्थों के रख रखाव तक में स्वच्छता का ध्यान नहीं होता। ये सारे कारण स्वास्थय और जीवन को जोखिम में डालने वाले हैं। बढ़ते बढ़ते ऐसा व्यवहार हमारी संवेदनशीलता को लील लेता है । नागरिकों में भ्रष्ट आचरण की शुरुआत इसी संवेदनहीनता से शुरू होती है। आंकड़े इस बात की पुष्टि करते हैं।

आज विश्व एक ग्राम में सिमट गया है । सूचना क्रांति ने हमारे सामने समूचे प्लेनेट को एक अंगुली के स्पर्श तक ला दिया है। बेहतरीन साहित्य आज एक क्लिक पर उपलब्ध है। मनोरंजन के बेहतरीन साधन हैं। मशीनों ने हमारा काम आसान कर दिया है। हमारी पहुंच और संपर्क कई गुना बढ़ गया है। दूरियां लगभग समाप्त हो चुकी हैं। यह सारा विकास बहिर्मुखी अधिक और अंतर्मुखी कम है। हम जिस बात की कमी आज महसूस कर रहे हैं वह हमारे बाहर नहीं कहीं अंदर से पैदा होगा। हम जितनी भी तरक्की करें पर खुद को, खुद के व्यवहार को, नैतिकता और जीवन मूल्यों को न भूलें। जीवन को प्रचुरता प्रदान करने वाली सुगंध कहीं भीतर है, उसे खोजा जाए कि जीवन कुसुमित हो उठे। हम एक एक व्यक्ति, जिम्मेदार, सभ्य और शिष्ट नागरिक बनें ताकि हम भारतीय, देश और दुनियां में अपने अच्छे व्यवहार और चरित्र से अपनी खोई हुई पहचान पुनः पा सकें।

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