मेरा भारत महान – रणजोध सिंह

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रणजोध सिंह – नालागढ़

गीता यहां, कुरान यहां

बाइबल और ग्रंथ साहिब भी

साथ-साथ यहाँ रहते हैं|

बेशक भिन्न वेश-भूषायें हैं,

बोलियां भी अपनी भिन्न है

फिर भी हर सुख-दुःख,

हम मिलजुल कर सहते हैं|

यूं ही नहीं !

मेरे देश को प्रेम की धरती कहते हैं|

 

सर्दी यहाँ, गर्मी यहाँ

बसंत यहाँ, शरद यहाँ

कभी रिमझिम मेघ बरसते हैं|

सागर यहाँ, पर्वत यहाँ

नदियाँ यहाँ, झरने यहाँ

लहके-दहके खेत, हर मौसम सोना उगलते हैं|

यूं ही नहीं !

मेरे देश को सोने की चिड़िया कहते हैं|

 

क्या चीन, क्या जापान

क्या इटली, क्या अमेरिका

सब भारत में सेध लगाते हैं|

योग यहाँ, अध्यात्म यहाँ

समस्त विश्व में भारतवासी

सबको गले लगाते हैं|

यूं ही नहीं !

मेरे देश को विश्व गुरु कहते हैं|

 

आक्रमण मेरे देश का

दस्तूर नहीं हरगिज

दुश्मन का हर नखरा

बड़े शोक से सहते हैं|

पर जब कोई अमन-शान्ति को,

कायरता समझने लगते हैं

जब ज़ेर-ओ-ज़बर के पानी,

सर से गुजरने लगते हैं|

फिर प्राणों की चिंता हम नहीं करते

दुश्मन से दुश्मन की भाषा में बातें करते हैं|

यूं ही नहीं !

मेरे देश को वीरों की धरती कहते हैं|

ग़ज़ल – रणजोध सिंह

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