उपहास (कहानी) — रणजोध सिंह

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ज़िंदगी – (मंडयाली नक्की कहाणी)
रणजोध सिंह

रणजोध सिंह

मई का महीना था| शिमला का माल रोड सदा की भांति सैलानियों से भरा हुआ था| कंबरमियर पोस्ट ऑफिस के पास इंदिरा गांधी युवा खेल परिसर में सैलानियों को आकर्षित करने के लिए एक भव्य मेले का आयोजन किया गया था जिसमें विभिन्न दुकानदार अपने अपने उत्पाद सैलानियों को पूरी शिद्दत से बेच रहे थे| जाने-अनजाने यदि कोई सैलानी उन दुकानदारों से ज़रा सी भी बात कर लेता, तो वह सिद्ध कर देते कि उसके समस्त दुखों का कारण उनके द्वारा बेचे जा रहे उत्पाद का उसके पास न होना है| बेचारा सैलानी यह सोच कर कि उस उत्पाद को खरीदने के बाद तो उसके सब दुखों का अंत हो जाएगा, आसानी से बलि का बकरा बन जाता|

मेरा एक परम मित्र अपनी धर्म-पत्नी संग, लुधियाना (पंजाब) से देव-भूमि हिमाचल की हसीन वादियों का लुत्फ़ उठाने शिमला आया हुआ था| दिनभर माल-रोड, रिज, और लक्कड़ बाज़ार की सैर करवाने के बाद मैं अपने मित्र को लेकर मेले में चला गया| एक दुकान के सामने मेरे मित्र की धर्म-पत्नी के पाँव स्वयं ही थम गए| कारण वह दुकानदार एक ख़ास किस्म की बेल्ट, इस दावे के साथ बेच रहा था, कि यदि हम उस बेल्ट को प्रतिदिन पंद्रह मिनट के लिए इस्तेमाल करेंगे, तो तीस दिन में हम कैटरीना कैफ (फिल्मी हीरोइन) की तरह स्लिम-ट्रिम हो जाएंगे| यद्यपि बेल्ट की कीमत सात हजार रूपये रखी गई थी, जो मेरे विचारानुसार काफी महँगी थी| परन्तु मेरे मित्र की अर्धांगिनी का वहां पर रुकना न्याय संगत था क्योंकि उसका वज़न अपनी उम्र की महिलाओं से काफी ज्यादा था और इस संसार में ऐसी कौन सी महिला होगी जो फिल्मी हीरोइनों की तरह स्लिम नहीं होना चाहती हो|

फिर पहाड़ों पर सैलानी तो आते ही हैं पैसे फेंकने के लिए| मेरा मित्र तुरंत उस बेल्ट को लेने के लिए तैयार हो गया| इससे पहले कि उसके मुंह से निकलता “पैक इट”, मैं तुरंत बोल उठा, “बॉलीवुड में अनेक ऐसे हीरो-हीरोइनस हैं जो अच्छे से अच्छे अभिनेता होने के बावजूद, भी मोटापे के कारण फिल्म इंडस्ट्री से बाहर हो गए हैं| यद्यपि वे करोड़पति हैं, खुद को स्लिम-ट्रिम रखने के लिए क्या वे सात हजार रूपये खर्च नहीं कर सकते? अरे! अगर एक लाख रूपये देकर भी कोई ऐसी बेल्ट मिल जाए, जिससे लगाकर वे पतले हो जाएं तो वे उस बेल्ट को खरीदने के लिए एक मिनट की भी देरी नहीं करेंगे|” एकाएक सभी लोग चुप हो गए| खैर मैंने तीर छोड़ दिया था, अब ये किसको कहाँ लगेगा, ये ईश्वर जाने| दुकानदार मुझे ऐसे देखने लगा जैसे कोई कड़क जेलर किसी सज़ायाफ़्ता मुज़रिम को देखता है| मेरी अपनी पत्नी भी कुछ ऐसी ही नज़रों से मुझे घूर रही थी, जबकि मित्र की पत्नी का चेहरा बिलकुल ही उतर गया था| परंतु मैं हार मानने वालों में से नहीं था| मेरे तरकश में अभी और भी तीर बाकी थे| मैंने सीधे दुकानदार से ही पूछ लिया, “क्यों भाई साहब मैं सत्य कह रहा हूँ न?” दुकानदार ने बिना किसी भूमिका के कहा, “आप सौ प्रतिशत सत्य कह रहे हैं, मगर साहब हमने भी रोटी खानी है बेशक आप बेल्ट न लें, मगर कम से कम मेरी दुकानदारी तो खराब न करें|”

हम बिना बेल्ट लिए हँसते-खेलते घर आ गए| सारे रास्ते में मेरे चेहरे पर विजयी मुस्कान थी| रास्ते में मित्र की पत्नी ने मेरा धन्यवाद करते हुए बताया कि आज मैंने सही समय पर उनका मार्गदर्शन कर दिया अन्यथा उनके स्टोर रूम में एक और बेकार वस्तु का इजाफा हो जाता|” वास्तव में वजन कम करने के चक्कर में वे पहले भी इस प्रकार के कई उत्पाद ले चुके थे जो अब उनके स्टोर-रूम की शोभा बढ़ा रहे थे| इस बीच मैंने उन्हें समझाया कि यह बाज़ारवाद है| पहले ग्राहक सुनिश्चित करता था कि उससे किन चीजों की आवश्यकता है और किन चीजों की नहीं| उद्योगपति उसकी रुचि को मध्य नजर रखते हुए चीजें बनाते थे| अब उद्योगपति पहले वस्तु बनाते हैं और फिर ग्राहक को बेचते हैं चाहे उससे उस वस्तु की आवश्यकता हो या न हो|

रात को सोते समय मैंने पाया कि एक स्टील का छोटा सा बॉक्स मेरे कमरे में पड़ा है जिसमें से हल्की सी आवाज आ रही थी| पूछने पर श्रीमती जी ने प्रसन्नतापूर्वक बताया कि इस बॉक्स से इतनी तेज ध्वनि निकलती है कि सुनने वाला पागल हो जाए| मगर अच्छी बात यह है कि यह ध्वनि इंसानों को सुनाई नहीं देती| केवल चूहे छिपकली या अन्य कीड़े-मकोड़े ही इसे सुन सकते हैं इस मशीन को लगाने से किसी भी प्रकार के कीड़े-मकोड़े घर में नहीं आते क्योंकि उनके कान इस शोर को सहन नहीं कर सकते|”

आधी रात के वक्त कमरे में कुछ खट खट की आवाज हुई| मैं और मेरी श्रीमती दोनो ही चोंक कर जाग गए| देखा तो आँखों पर विश्वास नहीं हुआ| दो चूहे उस बॉक्स के ऊपर चढ़े हुए मेरी श्रीमती जी के कथन का उपहास उड़ा रहे थे| मैंने हंसते हुए पूछा, “तुम तो कह रही थी कि इस मशीन के रहते चूहे हमारे घर में प्रवेश भी नहीं करेंगे, मगर यह तो मशीन को डांसिंग फ्लोर समझकर पार्टी कर रहे हैं, ये तो वही बात हुई कि कीड़े मारने वाली दवाई में ही कीड़े पड़ गए|” श्रीमती जी ने कोई प्रतिक्रिया नहीं की, मगर उसका चेहरा देखने लाइक था| खैर, मैंने उससे ढांढस बंधाते हुए समझया, “कोई बात नहीं प्रिये, यही है बाज़ारवाद और जाने-अनजाने तुम भी इसकी शिकार हो गई हो|

Read: अभाव की राजनीति (बाल कहानी)

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