चंद्रमा सी गोल और बर्फ सी सफेद लुच्ची पसंद थी रवीन्द्रनाथ टैगोर को: पारुल अरोड़ा

Date:

Share post:

पारुल अरोड़ा,
मकान क्र 138/5
पैलेस कॉलोनी, अस्पताल मार्ग 
मण्डी नगर, हिमाचल प्रदेश।

अंतरराष्ट्रीय महाशिवरात्री मेले मण्डी के आरम्भ होने से ही पूर्व मण्डी नगर के हलवाईयों की लोहे की बड़ी-बड़ी कढ़ाईयों में खोलते हुए तेल में चंदा मामा सी गोल और वर्फ सी सफेद रंग की गोलाकार नाव तरेरती हुई दिखती है। दूर बैठा इसका नाविक बड़े लोहे के चपु से इसे चला रहा होता है। जिसपर छोले या चने नामक यात्री सावार होकर इमली की चट्टानी के साथ ग्राहक के पेट में प्रवेश करतें हैं। लुच्ची खाने के लिए आपको अपनी बारी की प्रतीक्षा करनी पड़ती है। मण्डी के हलवाईयों से लेकर मण्डी मेला मैदान पड्डल में लगने वाली लुच्ची-चने की दुकानो में सारा दिन भीड़ लगी रहती है। मेले के दिनों में लुच्ची बनाने वाले कारीगरों की तो जैसे चांदी ही लग जाती है।

इंद्रजीत जी और सुदर्शन अरोड़ा जी बताते हैं कि 1950-60 के दशक में मण्डी महाशिवरात्री मेलें में मात्र सोलह आन्ने (एक रुपए) में लुच्ची-चने की सोलह थालीयां मिल जाती थी । लूची या लुचई शब्द संस्कृत के रुचि शब्द से बना है जिसका एक अर्थ है कुछ ऐसा जो स्वादिष्ट हो। हिमाचली प्रदेश के पहाड़ी क्षेत्र मण्डी (माण्डव्य नगर) में लुच्ची बंगाल के सेन वंश के राजाओं के साथ पहुंची थी। बंगाल के घरों का पारम्परिक और लोक प्रिय व्यंजन मण्डी महाशिवरात्री में विषेश स्थान रखता है। जिसे मण्डी में भी लुच्ची ही कहा जाता है। बंगाल की पारम्परिक लूची का आकार मण्डी की लुच्ची से छोटा होता है।

11वीं शताब्दी के आयुर्वेद के प्रसिद्ध आचार्य चक्रपाणि दत्त जी द्वारा लिखित द्रब्यगुन नामक ग्रंथ में शशकुला नामक महीन आटे और देसी गौ के घी से बनी तली हुई रोटी का उल्लेख है जिसे लूची का पूर्वज कहा गया है। भक्त सूरदास जी ने अपनी ब्रज कविता में लुचई का उल्लेख इस प्रकार किया है। लुचुई ललित लापसी सौ है। स्वाद सुबास सहज मन मोहई।। लुचुइ ललिता लापासी सोहाई, स्वाद सुबासा सहज मन मोहाई। विशेष कर बंगाल के कवियों, साहित्यकारों, लेखकों के लूची से सम्बंधित बहुत कुछ लिखा है। चंद्रमा सी गोल और बर्फ सी सफेद लुच्ची पसंद थी रवीन्द्रनाथ ठाकुर (टैगोर) जी को।

भारतीय स्वतंत्रता संग्राम में क्रांतिकारीयों को प्ररेणा प्रदान करने वाला हमारा राष्ट्रीय गीत वंदे मातरम की रचना करने वाले बंकिम चन्द्र चटर्जी जी अपने 1875 के उपन्यास कमलाकांतेर दप्तर में लिखा था यदि चंद्रमा लूची के रूप आकाश में उगता है, तो ह्रदय राहु में बदल जाएगा और उसे निगलने के लिए दौड़ेगा। अमृतलाल बसु जी लिखतें हैं। हे प्रिय लूची तुम तीनों लोकों में पूजनीय हो। बंगाली पाकशाला में लूची (लोचिका) एक तारा है जिसकी दशो दिशाओं में अन्य भोजन बनाए जाते हैं। बंगाल में बड़े घरों में लूची तलने के लिए विशाल उनान (मिट्टी का बर्तन) प्रयोग किया जाता है। जिसकी आग रावण की चिता की लपटों समान कभी नहीं बुझती है।

स्वामी विवेकानंद जी ने आधुनिक बंगाली व्यक्ति के मधुमेह और अपच के लिए लूची जैसी तले हुए भोजन को दोषी बताया है। अमृतसर में भी विशेष त्यौहारों में बड़े आकार की लूची बनाई जाती है। देश के अन्य भागों में भी लूची विषेश व्यंजनों की सूची में विद्यमान है। लूची व्यंजन से सम्बंधित, प्रियदर्शनी चटर्जी जी का लेख महत्वपूर्ण है। वहीं मण्डी पैलस काॅलोनी की देवी रानी महाशिवरात्री मेले मण्डी में आने वालों से कहती है कि, जब भी मण्डी मेले में आएं तो ‘लुड्डी नाचनी कन्ने लुच्ची खानी जरुर’।

चंद्रमा सी गोल और बर्फ सी सफेद लुच्ची पसंद थी रवीन्द्रनाथ टैगोर को: पारुल अरोड़ा

Daily News Bulletin

Nurturing Creativity – Keekli Charitable Trust, Shimla

LEAVE A REPLY

Please enter your comment!
Please enter your name here

Related articles

Sukhu Opens OBC Commission Office in Dharamshala

CM Sukhu on Tuesday virtually inaugurated the new office of the Himachal Pradesh State Commission for Backward Classes...

Sukhu Powers Up Sujanpur with New Sub-Station

CM Sukhu on Tuesday virtually inaugurated a 33/11 kV power sub-station at Patlander (Ansla) in Sujanpur Assembly constituency...

This Day in History

1944 D-Day — Allied forces initiated Operation Overlord, storming the beaches of Normandy in German-occupied France during World War...

HPAS Officers Transferred in Major Reshuffle

HPAS OFFICERS TRANSFER  The Himachal Pradesh government has ordered the transfer and posting of several Himachal Pradesh Administrative Service...