न मिट्टी न सीमेंट गारा : शिला पैगोडा शैली के मंदिर

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शिला पैगोडा शैली के मंदिर
प्रेषक : डॉ. कमल के . प्यासा

भगवान शिव को समर्पित पैगोडा शैली का यह शिव मंदिर मंडी ज़िला के,मंडी कुल्लू राष्ट्रीय उच्च मार्ग 22 के थलौट नामक कस्बे से लगभग दो किलो मीटर (सड़क के बायीं ओर) ऊपर की तरफ शाला नामक गाँव में पड़ता है। जो कि मंडी ज़िला कि ज्वालपुर का ही एक गांव है। अपनी शिला पैगोडा शैली विशेष के कारण ,इस मंदिर के निर्माण में किसी भी प्रकार के सीमेंट मिट्टी गारे आदि का प्रयोग नहीं किया गया। केवल मात्र पत्थर की शिलाओं को ही एक दूजे पर विशेष तकनीक से रख कर मंदिर का निर्माण किया गया है। मंदिर की इस शैली की विस्तार रूपी चर्चा पूर्व में मंदिरों की शैलियों के अंतर्गत कर दी गई है।

चार खंडों में बने इस मंदिर की ऊंचाई यही कोई 10 – 12 फुट के करीब की देखी गई है।मंदिर की आधार शिला, जो कि 4 फुट गुणा 4 फुट की है के ऊपर एक एक करके पूरे चार खंड इस प्रकार से देखे जा सकते हैं,जिनका का विवरण इस प्रकार से किया जा सकता है।प्रथम खंड जो कि आधार शिला पर बना है इसकी ऊपरी छत 4.5 फुट गुणा 4.5 फुट वाली शिला से बनी है तथा यह शिला चार खड़े 2.5 फुट ऊंचे थामों पर टिकी है। आधार शिला व छत शिला के चारों किनारों की ओर एक एक सुराख करके इन चारों थामों को पक्के ढंग से जकड़ा गया है।प्रथम खंड की इसी छत के नीचे ठीक मध्य में चार 2 फुट गुणा 1.5 फुट आकार की प्रतिमाएं रखी गई है ,जिनमें एक भगवान विष्णु की व तीन देवी मां की हैं।

इन चारों प्रतिमानों का मुख चारों ओर सामने की ओर ही रखा गया है।दूसरे खंड की छत की शिला का आकार 3 फुट गुणा 3 फुट है और इस छत के नीचे वाले खंड के मध्य में जो चार प्रतिमाएं स्थापित है उनका आकर 6 इंच गुणा 4 इंच का देखा गया है और ये हैं ,एक ओर आगे पीछे भगवान शिव व शेष एक ओर भगवान विष्णु व दूसरी तरफ देवी महिषासुरमर्दनी को दिखाया गया है। तीसरे वाले तल की छत का आकार नीचे वाली छत से कुछ और कम देखा जा सकता है।

इस तल के ठीक मध्य में एक गोलाकार त्रिमूर्ति ब्रम्हा,विष्णु व महेश की स्थापित है।चतुर्थ खण्ड अर्थात शीर्ष के ठीक मध्य में एक सिंह को दिखाया गया है ,जिसकी छत पर आमलक ,ग्रीवा ,आमलक व ऊपर शिव लिंग को रखे दिखाया गया है। शिला पैगोडा शैली के इस प्रकार के मंदिर केवल इसी क्षेत्र में देखे गए हैं , जो कि यहां के गांव गुमती, शारा व शाला ही हैं।कई जगह तो इस प्रकार के मंदिरों के केवल अवशेषों के ढ़ेर ही देखने को मिलते हैं।

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