चालान: रणजोध सिंह की कहानी

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 रणजोध सिंह
रणजोध सिंह

प्रोफेसर मदन अपनी निजी कार में मुन्नी बेगम की गज़लें सुनते हुए घर से कॉलेज जा रहे थे| अचानक एक पुलिस कर्मी ने हाथ के इशारे से गाड़ी को रोकने का आदेश दिया और गाड़ी के रुकते ही उसने प्रो. मदन से उनका ड्राइविंग लाइसेंस मांगा| कुछ आनाकानी के बाद प्रो. मदन ने अपना लाइसेंस पुलिस कर्मी को सौंप दिया| उसने कड़क शब्दों का प्रयोग करते हुए कहा, “आपने सीट बेल्ट नहीं बाँधी है, अत: आपका चालान करना पड़ेगा| प्रो. मदन ने चेक किया तो पाया उन्होंने सचमुच बेल्ट नहीं लगा रखी थी, मुन्नी बेगम की गज़लों के चक्कर में वे सीट बेल्ट लगाना भूल गए थे| इस बीच पुलिस कर्मी ने अपने बैग से चालान बुक निकाल ली और प्रोफेसर साहब की कार का चालान करने को उद्दत हुआ| प्रोफेसर साहब ने शर्मिंदा होते हुए उसे चालान न करने की प्रार्थना की, मगर वह टस से मस न हुआ|

जब प्रोफेसर साहब अनुनय-विनय करके थक गए तो उनकी प्रार्थना गुस्से में तब्दील हो गई| उन्होंने ऊंचे स्वर में कहा, “यहां प्रतिदिन सैंकड़ों गाड़ियां गुजरती हैं, तुमने उनके ड्राइवर्स की सीट बेल्ट तो कभी चेक नहीं की गई और आज अचानक तुम्हें चालान की याद आ गई|” मगर हाथ में आये शिकार को पुलिस कर्मी कहाँ छोड़ने वाला था| वह उतनी ही दृढ़ता से बोला, “आज जज साहिब स्वयं नाके पर हैं, यदि आप मौके पर चलन दे देंगे तो अच्छा है नहीं तो आपको चालान देने के लिए कोर्ट में जाना पड़ेगा|” प्रोफेसर साहब गुस्से में तो थे ही, पुलिस कर्मी की इन बातों ने आग में घी डालने का काम किया| वह तुरंत बोले, “आज तुम पहले चालान ही काट लो, फिर देखना मैं क्या करता हूं|” पुलिस वाले ने अविलंब कार का चालान काट दिया और चालान की एक कॉपी प्रो. मदन को सौंपकर चलता बना|

कॉलेज पहुँचकर जब उन्होंने अपने दोस्तों से इस बाबत चर्चा की तो सब ने एक ही स्वर में कहा, “ज्यादा अच्छा होता यदि आप चालान का भुगतान उसी समय कर देते, अब तो एक बार आपको जज के सामने जाना ही पड़ेगा| परंतु याद रखना जज तो जज होता है| वह तुम्हारे चालान की राशि बिल्कुल माफ भी कर सकता है या फिर कम-ज्यादा भी कर सकता है| कानून के जानकारों ने सलाह दी कि कोर्ट में जाना है तो हर हाल में विधिपूर्वक छुट्टी लेकर जाना, क्योंकि वहां पर हाज़री लगती है, और यदि उनका जाना संभव नहीं है तो वे एक वकील कर सकते हैं जो हज़ार-पंद्रह सो रुपए लेकर उनका काम कर देगा|

प्रो. मदन निर्धारित तिथि पर कॉलेज से छुट्टी लेकर कोर्ट पहुँच गए| जज साहिब के कमरे के बहार कुछ अत्यधिक परेशान से दिखने वाले लोग, काले कोट पहन कर अंदर-बाहर आ जा रहे थे, तो कुछ न्याय पाने की आशा में लम्बी कतार लगा कर न्याय के देवता के दर्शन करने को आतुर थे| कुछ ये साबित करना चाहते थे कि अमूक व्यक्ति ने उनके साथ घोर अन्याय किया है, तो कुछ ये साबित करने के चक्कर में थे कि उन्होंने किसी के साथ कोई अन्याय नहीं किया है, अत: वे बिलकुल निर्दोष है| प्रोफेसर साहिब जैसे लोगों को वहां बड़ी हीन दृष्टि से देखा जा रहा था क्योंकि वे उपरोक्त किसी भी श्रेणी में नहीं आते थे| वैसे भी उन्हें शहर के सभी लोग जानते थे, उन्हें देखते ही वे आश्चर्यचकित होकर पूछते, “अरे!

प्रो. साहिब आप यहाँ|” फिर वे सभी लोगों को उस अड़ियल पुलिस कर्मी की कहानी सुनाते| लोग सुहानुभूति प्रकट करते और कोई न कोई बहाना बना कर कन्नी काट लेते| उन्हें इंतजार करते-करते लगभग सारा दिन बीत गया मगर जब शाम के चार बजे उनका नाम पुकारा गया, तो उन्हें इतनी प्रसन्नता हुई मानो ईश्वर मिल गया हो| जज एक युवा महिला थी| प्रोफेसर साहब को देखकर उसने मुस्कुराते हुए पूछा, “आप क्या करते हो?” “मैं कॉलेज में पढ़ता हूं|” प्रो. मदन ने शीघ्रता से जवाब दिया| जज ने एक बार चालान की कापी देखी और एक बार प्रोफेसर मदन को|

फिर गंभीर होकर बोली, “अच्छा तो आप कॉलेज में पढ़ाते हैं, ऐसा कीजिए, आप अगले हफ़ते सात तारीख को आइए, तब तक के लिए मैं आप का केस पेंड करती हूँ|” प्रो. मदन को जज साहिबा पर अत्यधिक क्रोध आया, पर जिसके सामने सब लोग मी-लॉर्ड, मी-लॉर्ड कहते हुए गिड़गिड़ा रहे हो उसके साथ कोई बहसबाजी न करने में ही उन्हें अपनी भलाई नज़र आई|
अगले हफ़ते वे दोबारा छुट्टी लेकर कोर्ट पहुँचे| मगर इस बार ईश्वर उनके ऊपर काफी मेहरबान था, अतः सुबह कोई गयारह बजे के आसपास ही उनका नंबर आ गया| जज ने मुस्कुराते हुए कहा, “प्रोफेसर साहब वैसे तो सीट बेल्ट का चालान मैं एक हज़ार से ज्यादा नहीं करती हूँ मगर क्योंकि आप कॉलेज में पढ़ते हैं और विद्यार्थियों को ज्ञान बांटने का काम करते हैं|

अब अगर आप भी अभी रूल तोड़ेंगे तो बाकी लोग क्या करेंगे? आपको आपकी जिम्मेदारी का एहसास करवाना जरूरी है, इसलिए मैं आपको दो हज़ार की राशि सरकारी के खज़ाने में जमा करवाने का आदेश देती हूं|” प्रो. मदन ने बिना किसी प्रतिक्रिया, सरकारी ट्रेजरी की लम्बी लाइन में लगकर दो हज़ार रुपए जमा करवा दिए और चैन की साँस ली| अब तक वो अच्छी तरह समझ चुके थे कि जिम्मेदार पद पर बैठे हुए लोगों से समाज की अपेक्षाएं आम लोगों से अधिक होती हैं|

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