प्रो. रणजोध सिंह

राम प्रसाद जी ने स्वयं को कमरे में ही कैद कर लिया था, ताकि उनकी खांसी से घर के अन्य सदस्यों को परेशानी न हो | उनका बेटा सुबह-शाम उनके कमरे पर धीरे से दस्तक देता और  दरवाज़े की दहलीज़ से ही पूछता, कि उन्होंने नाश्ता कर लिया ? चाय तो नहीं चाहिए ? बहू पूछती खाना लगा दू, या बोतल में गर्म पानी भर दू ?

लेकिन वो तो उनसे ज़माने भर की बातें करना चाहते थे | पर हरदम मोबाइल से चिपके रहने वाले उनके बेटे और बहू के पास इतना वक्त नहीं था कि वे बजुर्ग की यह इच्छा पूरी कर पाते |

परन्तु उनके दस वर्ष के पोते को कोई दहलीज़ रोक न पाती थी, वह बड़े अधिकार से उनके कमरे आ धमकता और सवाल-जवाबों की लम्बी झड़ी लगा देता | एक दिन बड़ी मासूमियत से कहने लगा, “दादा जी मम्मी-पापा आपसे नाराज़ हैं क्योंकि आप बूढ़े हैं,” इससे पहले कि राम प्रसाद कोई उत्तर देता पोते ने अगला सवाल फिर दाग दिया, “आप बूढ़े क्यों हो गए?”

“ताकि मेरे मरने पर किसी को कोई दुःख न हो,” राम प्रसाद जी कहना चाहते थे | पर एक दादा अपने पोते से यह कह न पाया और कान पकड़ कर बूढ़ा होने की ग़लती के लिये माफ़ी मांगने लगा |

(सम्पर्क: सन विला फ्रेंड्स कॉलोनी, नालागढ़, जिला सोलन, हिमाचल प्रदेश, पिन 174101  ; मोबाइल: 9418158741; ईमेल: [email protected])

1 COMMENT

  1. संवेदनशील रचना! कुछ रचनाओं की प्रशंसा के लिए शब्द नहीं बने होते…..

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