पौराणिक कथाओं में बसंत पंचमी: डॉo कमल केo प्यासा

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डॉo कमल केo प्यासा
प्रेषक : डॉ. कमल के . प्यासा

समस्त छ ऋतुओं में से ऋतु बसंत को ही महता देते हुवे इसे ऋतुराज, (सबसे सुखद तथा मनमोहक ऋतु ) कहा जाता है ,क्योंकि इस ऋतु में न ही तो अधिक सर्दी ही रहती है और न ही गर्मी।एक ओर सर्दी का अंत होने को होता है तो दूसरी ओर मौसम में परिवर्तन के कारण कुछ मीठी मीठी गर्मी का भी एहसास एहोने लगता है। इस तरह मौसम बड़ा ही सुहावना हो जाता है।

तभी तो इस सुहावने मौसम की ऋतु के लिए ही इसे ऋतुराज शब्द से संबोधित किया जाता है। इस ऋतु में सभी जीव जंतुओं में नई उमंग और स्फूर्ति आ जाने के साथ साथ ,समस्त प्रकृति में भी सक्रिय हो जाती है और सभीओर ताजगी ही ताजगी का अनुभव सा होने लगता है। चारों ओर हरियाली, पीले व अन्य भांत भांत के फूलों की भीनी भीनी महक वायुमंडल को मेहका देती है।

इन सबके साथ ही साथ, समस्त (नीरस पतझड़ के ) सूकेपन में भी रंग बिरंगी तितलियों व भंवरों की गुनगुनाहट से एक अजीब सी मादकता विचरने लगती है।पेड़ पौधों में नई नई कोपलों व पत्तों के फूटने से साथ चारों ओर हरियाली देखते ही बनती है। पक्षियों के चहकने की मीठी मीठी आवाजे सुनने को मिलती हैं फिर भला कैसे हमारी प्रकृति इससे वंचित रह सकती है। तभी तो हमें एक नई चेतना व उमंग का आभास सा होने लगता है और कल कल करती नदियां झरने,पशु पक्षी सभी मस्ती में दिखते हैं।

ब्रह्माण्ड व सृष्टि की उत्पति ,रखरखाव व चक्रण की जब बात होती है तो इसके लिए हमारे प्रमुख तीन पौराणिक देवताओं में ब्रह्मा,विष्णु व महेश(भगवान शिव)का नाम आता है। ऐसी ही एक पौराणिक कथा के अनुसार कहते हैं कि जब देव ब्रह्मा ने सृष्टि के निर्माण के साथ जीव जंतुओं की उत्पति की तो उसके पश्चात देव ब्रह्मा अपने द्वारा बनाई सृष्टि को देखने को खुद ही निकल पड़े ,लेकिन वह अपने काम को देखकर बड़े ही निराश हो गए ,क्योंकि रचित सृष्टि में किसी भी प्रकार की न ही तो कोई गति थी और न ही किसी प्रकार की ध्वनि आदि का कोई संकेत था। सारा वातावरण शांत मौन व नीरस ही दिख रहा था।

इस लिए वह (देव ब्रह्मा जी )इसके निवारण हेतु भगवान विष्णु जी के पास पहुंचे और उन्हें अपनी सारी व्यथा कह डाली। भगवान विष्णु ने समाधान हेतु महा शक्ति देवी दुर्गा को याद कियाऔर वे वहीं प्रकट हो गईं।उनके( मां दुर्गा के )वहां पहुंचने पर ही वहीं उनके शरीर से विशेष ऊर्जा सहित एक ज्योति पुंज निकला जो कि देखते ही देखते एक सुंदर सफेद वस्त्र धारी देवी रूप में परावर्तित हो गया।इस तरह प्रकट हुई देवी के हाथों मे वीणा,पुस्तक,माला व एक हाथ वरद हस्त मुद्रा में था।

देवी को ज्ञान की देवी सरस्वती के नाम से जाना गया। देवी सरस्वती ने ज्यों ही अपनी वीणा का वादन किया तो तो सारी सृष्टि में नई चेतना जागृत हो गई,पशु पक्षी चहकने लगे,मंद मंद समीर चलने लगी और झरनों ,झीलों व नदियों में कल कल करके जल धारा बहने लगी। इस तरह तभी से देवी सरस्वती की उपासना ज्ञान प्राप्ति,कला,गीत संगीत,नृत्य व अन्य सभी तरह शिक्षात्मक ज्ञान के लिए की जाने लगी।

इसी बसंत ऋतु में जिस दिन देवी मां सरस्वती प्रकट हुई उस दिन पंचमी का दिन था ,इसी लिए देवी सरस्वती के इस दिन को इनके जन्म दिन के रूप में बसंत पंचमी के नाम से जाना व मनाया जाता है और तभी से बसंत पंचमी माघ मास के शुक्ल पक्ष की पांचवीं तिथि को मनाई जाती है ,इसी दिन से बसंत ऋतु का भी शुभारंभ होता हैऔर देवी सरस्वती की पूजा इस दिन विशेष रूप से की जाती है,जिसमें पीले रंग के बिछौने पर देवी की प्रतिमा या फोटो को रखा जाता है। पूजा के लिए पीले रंग के फूलों के साथ ही साथ प्रसाद भी पीले रंग का ही रखा जाता है।देवी को टीका भी पीले रंग में चंदन का ही लगाया जाता है।

पीले रंग का इस दिन विशेष महत्व रहता है क्योंकि पीले रंग कोपवित्र,सकारात्मक,शांत,शीतल, समृद्धि देने वाला एक ऊर्जा का प्रतीक माना जाता है।तभी तो बसंत पंचमी के दिन सभी पीले रंग के ही वस्त्र धारण करते हैं,पीली वस्तुओं को आपस में बांटते हैं व पीली वस्तुओं का दान देना इस दिन शुभ माना जाता है। घरों में पीले रंग के पकवानों को बनाने व खाने को भी शुभ बताया जाता है। हलुवा व चावल आदि विशेष रूप से हल्दी केसर के साथ पीले रंग के तैयार किए जाते हैं। आकाश पर अधिकतर पतंगें पीले हीरंग की उड़ती देखने को मिलती है। बसंत पंचमी के इस पवित्र त्यौहार का कई अन्य घटनाओं से जुड़े होने के कारण ही इसका महत्व और भी बड़ जाता है,जैसे सिखों के दशम गुरु गोविंद सिंह जी का इस दिन विवाह हुआ था।

गुरु राम सिंह कूका जी का इस दिन 1816 ई0 को जन्म हुआ था। इसी दिन वीर हकीकत राय जी का बलिदान दिवस भी मनाया जाता है।इसी दिन ई0 1192 में पृथ्वी राज चौहान ने मौहम्मद गौरी को मार गिराए था तथा बाद में इसी दिन पृथ्वी राज चौहान व चंद्रवरदाई ने आत्मबलिदान भी कर लिया था। कहते हैं कि इसी दिन देवी माता लक्ष्मी का भी जन्म दिन मनाया जाता है और तभी इसे श्री पंचमी भी कहते हैं। कहीं कहीं शास्त्रों में इसे ऋषि पंचमी भी कहा गया है। फिर सभी तरह की विद्याओं से संबंधित होने के कारण ही इसे ज्ञान पंचमी के नाम से भी जाना जाता है। देवी सरस्वती जी के जन्म दिवस पर मनाए जाने वाले बसंत पंचमी (इस पवित्र त्यौहार )के शुभ अवसर पर कला, संगीत ,नृत्य व ज्ञान की देवी को शत शत नमन।

पौराणिक कथाओं में बसंत पंचमी: डॉo कमल केo प्यासा

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