दो सहेलियाँ — रणजोध सिंह

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ज़िंदगी – (मंडयाली नक्की कहाणी)
रणजोध सिंह

रणजोध सिंह

बहुत कम लोग होते हैं जो अपने बचपन के दोस्तों के साथ ताउम्र रिश्ता बनाये रखते हैं, खासतौर पर लडकियाँ | लेकिन पाखी और महक इस का अपवाद थी | शादी के कई वर्ष बाद भी दोनों की दोस्ती सलामत थी और यदा-कदा एक दुसरे के घर भी आना-जाना था | इसका सबसे बड़ा कारण था दोनों का एक ही शहर में रहना | दोनों सहेलियों को जब किसी जरुरी काम से बाहर जाना पड़ता तो बच्चें एक दुसरे के घर में छोड़ कर, बेखोफ़ निकल जाती थी |

पाखी का विवाह एक साधन-सम्पन्न घर में हुआ था और उसके दोनों बच्चे भी अपने परिवार के स्टेटस अनुसार खूब खर्चीले व नखरैल थे | जबकि महक का परिवार आर्थिक रूप से इतना सक्षम नहीं था | इसलिए जब कभी पाखी अपने बच्चों को महक के घर छोड़ कर जाती, तो महक तनाव में आ जाती क्योंकि आर्थिक रूप से कमज़ोर होने के बावजूद भी वह उन बच्चों को किसी प्रकार की कमी न आने देती थी | ये अलग बात है कि इन बच्चों की फरमाइशें को पूरा करने में उसके घर का सारा बजट बिगड़ जाता था |

पाखी और महक के बच्चें मिलकर खूब खेलते, उधम करते, शोर मचाते और पूरे घर को अस्त–व्यस्त कर देते मगर महक ने न कभी बच्चों को लेकर कोई शिकवा किया और न कभी अपनी आर्थिक परेशानी का ज़िक्र पाखी से किया | वह अपने बचपन की सहेली पाखी से बहुत प्रेम करती थी और किसी भी कीमत पर उसे खोना नहीं चाहती थी जबकि सच्चाई यह थी कि वह अपनी सहेली के बच्चों के खर्चों व नखरों से काफी परेशान थी | परन्तु वह चाह कर भी कोई भी निर्णय नहीं ले पा रही थी |

एक दिन सदा की भांति पाखी भागती हुई महक के घर पहुँची और बच्चों को उसके हवाले कर अपने काम के लिए निकल गई | शाम को जैसे ही पाखी बच्चों को लेने पहुँची, महक ने गर्म चाय के साथ उसका स्वागत किया |

“बच्चों ने ज्यादा तंग तो नहीं किया |” पाखी ने शंका जताई |

“अरी नहीं! बिलकुल नहीं |” महक ने मुस्कुराते हुए उत्तर दिया | वह थोड़ी देर के लिए रुकी और फिर लम्बी साँस लेकर गंभीरतापूर्वक, सौम्य भाषा का प्रयोग करते हुए बोली, “वैसे आज मुझे रितेश के साथ उनके कुछ मेडिकल टेस्ट करवाने के लिए अस्पताल जाना था, मगर मेरी व्यस्तता के चलते, इन्हें अकेले ही जाना पड़ा |”

इधर पाखी जो महक पर अपना पूरा अधिकार समझती थी, को पहली बार ये एहसास हुआ कि महक की भी कोई व्यस्तता हो सकती है | रितेश के मेडिकल टेस्ट के बारे में जानकार वह काफी शर्मिंदा हुई मगर बिना कोई प्रतिक्रिया किये वह अपने घर के लिए निकल गई |

महक अब इस बात से परेशान थी कि पारिवारिक समस्याओं के चलते कहीं वह अपनी प्यारी सखि को खो न दे | उसे तसल्ली तब हुई जब पाखी ने फोन पर उसे समझाते हुए कहा, “मुझे ज़रा सा भी पता होता कि आज तुम्हेँ जीजु के साथ अस्पताल जाना है, तो मैं बच्चों को तुम्हारे पास कभी न छोडती | देख यार, हमें एक दूसरे से मिलना-जुलना चाहिए, मगर अपने घरों की जिम्मेदारियों का बोझ एक दूसरे पर नहीं डालना चाहिए | क्योंकि अब हम अकेली नहीं, एक भरा-पूरा परिवार भी हमारे साथ रहता है | उनकी आवश्कताओं का सम्मान करना और उनका ख्याल रखना भी हमारा ही काम है मेरे विचार से हमें अपने बच्चें एक-दुसरे के घर तब तक नहीं छोड़ने चाहिए जब तक यह अति आवश्यक न हो |”

महक ने तुरंत पाखी की बात का समर्थन करते हुए मन ही मन ईश्वर को धन्यवाद दिया, क्योंकि उनकी दोस्ती की गाड़ी स्वत: पटरी पर आ गई थी |

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