रोटी माँ के हाथ की — रणजोध सिंह

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रणजोध सिंह

श्यामली के बार-बार समझाने पर भी उसका पति निखिल अंतिम समय तक अपने बुजुर्ग माँ-बाप को यह न बता पाया कि वह सदा-सदा के लिए विदेश जा रहा है | वह हर बार उन्हें यही आश्वासन देता कि कुछ ही दिन की बात है कंपनी में तरक्की लेने के लिए बाहर जाना जरूरी है अन्यथा वह कभी न जाता |

पापा जी उसकी मजबूरी समझते हुए मन को पक्का कर उसके इस निर्णय से सहमत हो जाते मगर ममता से बंधी हुई माँ को यह समझना मुश्किल था कि रोटी कमाने के लिए बेटे और बहु का विदेश जाना जरुरी क्यों है |

आँखों में सुनहरी सपने संजोय निखिल व श्यामली निर्धारित समय पर विदेशी धरती पर थे | वहां का आलम सचमुच ही बड़ा रंगीन था चारों तरफ हरियाली ही हरियाली, धूल का नामोनिशान नहीं, साफ-सुथरी चोड़ी सड़के, गगनचुंबी इमारतें, बड़े-बड़े शोप्पिंग माल, पार्क रेस्तरां और सभ्य लोग| वे अभिभूत हो गए इस धरती के, जीने को और क्या चाहिए |

लेकिन कुछ ही दिनों में, वे अपनी-अपनी नौकरियों में इस कद्र व्यस्त हुए कि एक दूसरे के लिए ही अजनबी बन गए | निखिल नाइट शिफ्ट के कारण रात नो बजे एक निजी कम्पनी में जाता था और सुबह सात बजे से पहले घर नहीं पहुंचता था | जबकि श्यामली सुबह आठ बजे घर से निकलकर शाम को छः बजे घर पहुंचती थी | यद्यपि शनिवार और रविवार को उनके पास छुट्टी होती थी मगर जितने भी भारतीय वहां रह रहे थे, उनमें से अधिकांश शनिवार और रविवार को भी अतिरिक्त काम करते थे ताकि उनका जीवन यापन सुगमतापूर्वक हो सके | उन्हें यह भी पता चला कि बहुत से भारतीय जैसे-तैसे अपना घर या गाड़ी खरीद तो लेते हैं मगर उनकी शेष जिंदगी कर्ज के बोझ तले दब कर रह जाती है |

यद्यपि डॉलर के साए में वहां सभी सुख सुविधाएं मौजूद थीं, मगर कमी थी तो आपसी प्यार-मोहब्बत की | अपने मोहल्ले में निखिल प्रतिदिन पचासों लोगों को सलाम करता था और सैकड़ों लोग उसे | मगर यहाँ किसी के पास इतनी फुर्सत नहीं थी कि कोई किसी की तरफ आँख उठाकर भी देखे क्योंकि यहाँ हर व्यक्ति का एक मात्र उदेश्य था अधिक से अधिक डॉलर इकट्ठे करना | कहीं न कहीं भारतीय संस्कारों की आत्मा इस नव-दम्पती में जीवित थी इसलिए धीरे धीरे वे यहाँ घुटन महसूस करने लगे |

एक दिन श्यामली को पता चला की वह गर्भवती है, उसने जैसे ही यह खबर निखिल को दी, उसकी प्रसन्नता का परावार न रहा | उन्होंने तुरंत आने वाले नवंतुक को लेकर अनेक सुनहरी ख्वाव देख लिए | मगर श्यामली ने जब यह खबर अपनी सह-कर्मी से शेयर, वह काफी परेशान हो गई और उसने स्पष्ट हिदायत दी, “जब तक सम्भव हो, परिवार न बढ़ाना क्योंकि यहाँ पर नौकरी शुदा लोगों के लिए जिन्दगी का सबसे मुश्किल दौर छोटे बच्चों को पालना ही है|”

इस भारतीय जोड़ी के लिए यह खबर किसी ज़ोरदार झटके से कम न थी | कुछ दिन बाद श्यामली के घर से फोन आया | उसकी माँ सख्त बीमार थीं | श्यामली अपनी माता श्री से बहुत प्रेम करती थी | उसके मन में आया कि वह उड़कर माँ के पास चली जाए, परन्तु भारत जाने के लिए उन्हें दर्जनों औपचारिकताओं को पूरा करना था, जब तक इस जोड़ी की टिकटें कन्फर्म हुई, श्यामली की माँ इस नश्वर दुनिया को छोड़ कर चली गई |

श्यामली अचानक आसमान से धरती पर आ गिरी | फिर एक सुहानी सुबह डोर वेल बजने पर निखिल की माँ जी यह सोच कर गेट पर गई कि शायद सफ़ाई-वाला आया है, मगर यह क्या, सामने निखिल-श्यामली खड़े थे | वह उनको देखकर स्तब्ध रह गई | माँ-पापा ने उन्हें ऐसे गले लगाया कि उनकी आँखों से गंगा-यमुना बह निकली |

भावावेश के क्षणों बाद पापा जी ने थोड़ा व्यवहारिक होते हुए पूछा, “कितने दिन के लिए आए हो?”

“सदा-सदा के लिए, अब तो रोटी माँ जी के हाथ की ही खानी है|” निखिल और श्यामली एक साथ चहकते हुए माँ को गले लगा लिया |

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